त्रिशक्ति मां सरस्वती, मां लक्ष्मी, मां काली पिंडी रुप में यहां है विराजमान

-14वीं सदी में एक ब्राह्मण ने ढू़ंडी थी माता वैष्षों की पावन गुफा
-भैरव नाथ के दर्शन बिना नहीं पूरी होती यात्रा
भारतीय संस्कृति अनुसार त्रिदेव भगवान ब्रह्मा, भगवान हरि विष्णू और भगवान महादेव को इस समूचे ब्रह्मांड का रचियचा माना गया है। परंतु आदिशक्ति के विभिन्न रुप संपूर्ण जगत के मन में विश्वास की शक्ति व आस्था को जन्म देती हैं। शास्त्रों में यह सर्वविदित है कि इंसान परमपिता परमात्मा की आज्ञा से ही मंदिरों में प्राण-प्रतिष्ठित अपने ईष्ट, देवी देवताओं के दर्शन करने में सफल होता है। वहीं मंदिरों में प्राण प्रतिष्ठित देवी देवताओं इंसान को दर्शन देकर उनके पापों का नाश करते हैं। देश के कोने-कोने में स्थापित अनगिनित मंदिरों में कुछ को शक्तिपीठ का भी दर्जा प्रदान किया गया है। जम्मू कश्मरी के उधमपुर जिले के कटड़ा से करीब 12 किलोमीटर दूर उत्तर पश्चिचम हिमालय के त्रिकुटा पर्वत की एक गुफा में पिंडी रुप में वास करने वाले विद्या की देवी मां सरस्वती, धन की देवी मां लक्ष्मी, दुष्टों का नाश करने वाली मां काली अपने भक्तों को दर्शन देकर कृतार्थ करती है।


मां वैष्णों के सच्चे दरबार में माता की आज्ञा से ही होते हैं दर्शन
वैदिक ग्रंथों में त्रिकूट पर्वत का उल्लेख मिलता है। इसके अलावा महाभारत में भी अर्जुन द्वारा जम्मू क्षेत्र में वास करने वाली माता आदिशक्ति की आराधना का वर्णन है। मान्यता है कि 14वीं सदी में श्रीधर ब्राह्मण ने इस गुफा को खोजा था। माता वैष्णों देवी की पावन गुफा को मां के सच्चे दरबार से भी जाना जाता है। माता के भक्तों में आस्था है कि माता जब बुलाती है, तभी आप माता के दर्शन होते हैं। जो बिना बुलाए हठ कर जाता है। वह चाहे कितनी भी कोशिश कर लें, माता उसे दर्शन नहीं देती है। इस पावन गुफा में आदिशक्ति के तीनों रूप ज्ञान की देवी महासरस्वती, धन वैभव की देवी महालक्ष्मी और शक्ति स्वरुपा महाकाली या मां दुर्गा पिंडी रुप में वास करती है। भूगर्भशास्त्रिओं अनुसार यह पावन गुफा अरबों साल पुरानी है। माता की यह पावन गुफा त्रिकुटा पर्वत में उत्तरी जम्मू से 61 किमी की दूरी पर स्थित है। माता की इस पवित्र गुफा के दर्शन करने से पहले भक्त देवामाई, बाण गंगा, चरण पादुका, गर्भ जून गुफा के दर्शन करते हैं। माता के दर्शन के बाद भैरव नाथ मंदिर के दर्शन किए बिना यात्रा को अधूरा माना जाता है।

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माता के दर्शनों से पहले स्थापित मंदिर
मां वैष्णों के सच्चे दरबार के दर्शन से सर्वप्रथम कटड़ा से लगभग दो किलीमीटर की दूरी पर प्राचीन भूमिका मंदिर स्थित है। माना जाता है कि लगभग 700 वर्ष पहले यहां पर पंडित बाबा श्रीधर को माता ने कन्या रूप में साक्षात दर्शन दिए थे। बाबा श्रीधर ने कन्या की आज्ञानुसार यहां भंडारा किया था।

माता की चरण पादुका
इस मंदिर के दर्शन के बाद चरण पादुका में माता के चरण चिह्न के दर्शन होते हैं। यहां पर माता वैष्णों देवी के चरण चिह्न एक शिला पर दिखाई देते हैं। इसी स्थान पर महाशक्ति ने रूक कर पीछे की ओर देखा था कि भैरवनाथ उसके पीछे आ रहा है या नहीं। इसी स्थान पर रुकने के कारण ही इस स्थान पर माता के चरण चिह्न बन गए थे।

 


चरण पादुका मंदिर के बाद बाण गंगा
भैरवनाथ से दूर भागते हुए माता वैष्णों ने एक बाण भूमि पर चलाया था। जहां से जल की धारा फूट पड़ी थी। यही स्थान आज बाणगंगा के नाम से प्रसिद्ध है। यह कटड़ा से करीब ढाई किलोमीटर की दुरी पर स्थित है। यह जल की धारा समाखल क्षेत्र के 200 फीट ऊंचे पहाड़ के बीच से निकलती बताई जाती है।


अर्धकुमारी या गर्भ जून
यह पावन स्थल माता वैष्णों देवी की यात्रा का मध्य पड़ाव कहा जाता है। यहां पर एक संकरी गुफा है। जिसके लिए मान्यता है कि इसी गुफा में बैठकर माता ने 9 माह तप कर शक्ति प्राप्त की थी। इस गुफा में गुजरने से हर भक्त जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। यह गुफा माता के गर्भ समान है।

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हाथी मत्था
अर्धकुमारी से आगे पहाड़ी यात्रा सीधी खड़ी चढ़ाई के रूप में शुरु हो जाती है। इसी कारण इस यात्रा को हाथी मत्था के समान माना गया है।

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सांझी छत
हाथी मत्था यात्रा के बाद सांझी झत से त्रिकूट पर्वत व उसकी घाटियों के मनमोहक दर्शन होते हैं। यहां पर माता के दर्शन करने पहुंचे भक्त विश्राम करते हैं।

माता का पावन भवन
सांझी झत के बाद भक्तगण सीधे माता के दरबार पहुंचते हैं। माता के दरबार में 30 मीटर लंबी गुफा के भीतर महासरस्वती, महालक्ष्मी और महादुर्गा पाषाण पिंडी के रुप में विराजमान है। इस गुफा में सदा ठंडा जल प्रवाहित होता रहता है। जिससे गुजरने के बाद ही माता के दर्शन होते हैं। मौजूदा समय में भक्तों की सुविधा की दृष्टि से माता के दर्शन हेतु अन्य गुफा का निर्माण कर दिया गया है।


भैरव नाथ मंदिर
भैरव नाथ का यह मंदिर माता रानी के भवन से भी लगभग डेढ़ किलोमीटर अधिक ऊंचाई पर स्थित है। माता द्वारा भैरवनाथ को दिए वरदान के अनुसार जो भक्त भैरव नाथ के दर्शन नहीं करेगा। उसकी यात्रा अधूरी रहेगी।

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जगत जननी माता वैष्णों देवी से संबंधित पौराणिक कथाएं
पहली कथा-हिंदू पौराणिक मान्यताओं अनुसार जगत में धर्म की हानि होने और अधर्म के बढ़ने के कारम ही त्रिशक्ति महासरस्वती, महालक्ष्मी और महादुर्गा ने एक कन्या के रुप में प्रकट हुई। यह कन्या त्रेतायुग में भारत के दक्षिणी समुद्री तट रामेश्वर में पंडित रत्नाकर की पुत्री के रूप में अवतरित हुई। लंबे से समय से संतानहीन रत्नाकर ने बच्ची को त्रिकुटा का नाम दिया। परन्तु भगवान विष्णु के अंश रूप में प्रकट होने के कारण ‘वैष्णवी’ नाम से विख्यात हुई। लगभग 9 वर्ष की होने पर उस कन्या को जब यह मालूम हुआ कि भगवान विष्णु ने इस भू-लोक में श्रीराम के रूप में अवतार लिया है। तब वह भगवान श्रीराम को पति मानकर उनको पाने के लिए तप करने लगी। जब श्रीराम सीता हरण के बाद सीता की खोज में रामेश्वर पहुंचे। तब उन्होंने समुद्र तट पर ध्यानमग्र कन्या को देखा। उस कन्या ने भगवान श्रीराम से उसे पत्नी के रूप में स्वीकार करने विनती की। श्रीराम ने उस कन्या से कहा कि वह इस जन्म में सीता से विवाह कर एक पत्नी व्रत का प्रण ले चुके हैं। कलियुग में मैं जब कल्कि अवतार लूंगा। तब तुम्हें अपनी पत्नी रूप में स्वीकार करुंगा। तब तक तुम हिमालय स्थित त्रिकूट पर्वत की श्रेणी में जाकर तप करो और भक्तों के कष्ट और दु:खों का नाश कर जगत का कल्याण करो।

दूसरी कथा-एक पुरातन कथा माता ने अपने परम भक्त पंडित श्रीधर की भक्ति से प्रसन्न होकर उसकी लाज बचाई। कटड़ा कस्बे से दो किलोमीटर दूरी पर स्थित हंसाली गांव में माता वैष्णों परम भक्त श्रीधर रहते थे। वह नि:संतान होने से दु:खी रहते थे। एक दिन पंडित श्री धर ने नवरात्रि पूजन के लिए बाल कन्याओं को बुलवाया। माता भी कन्या वेश में वहां पर पहुंच गई। पूजन के बाद सभी कन्याएं तो चली गई। परंतु माता वैष्णों वहीं रुक कर श्रीधर से बोली जाओ सभी को अपने घर भंडारे का निमंत्रण दे आओ। श्रीधर ने उस कन्या की बात मान ली। गांवों में भंडारे का संदेश देने के दौरान गुरु गोरखनाथ के शिष्य बाबा भैरव नाथ व उनके शिष्यों को भी भोजन का निमंत्रण दिया। भोजन का निमंत्रण पाकर सभी गांववासी अचंभित थे कि वह कौन सी कन्या है जो इतने सारे लोगों को भोजन करवाना चाहती है। कन्या रूपी माता वैष्णों ने एक दिव्य पात्र से सभी को भोजन परोसना शुरू किया। भोजन परोसते समय जब वह भैरवनाथ के पास गई। तब बाबा ने कहा कि मैं तो खीर पूड़ी के स्थान मांस और मदिरा का सेवन करुंगा। कन्या रुपी माता ने उसे समझाया। पर वह नहीं माना। जब भैरवनाथ ने उस कन्या को पकडऩा चाहा। तब माता उसके कपट को समझ कर वायु रूप को धारण कर त्रिकूटा पर्वत की तरफ उड़ चली। भैरवनाथ भी पीछे गया। माता के गुफा में विराजमान होने से पहले रास्ते में स्थापित स्थान चरण पादुका, वाण गंगा, गर्भ जून आज भी विद्यमान है।
इस घटना से पंडित श्रीधर विचलित हो गए। वह दिव्य कन्या के पीछे-पीछे त्रिकुटा पर्वत पहुंचे। गुफा के द्वार पर पहुंच कर उन्हें आदिशक्ति पिंडी के रुप में दिखाई दी। विधि विधान से उन्होंने माता के पिंडी रुप का पूजन शुरु कर दिया। तब देवी पूजा से प्रसन्न हो प्रकट हुई। उन्होंने पंडित को आशीर्वाद दिया। तब से आजतक श्रीधर व उनके वंशज ही देवी माता वैष्णों की पूजा करते आ रहे हैं।

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माता पूजन का समय
माता वैष्णों देवी की रोजाना विधि विधान से पूजा की जाती है। यहां विशेष पूजा का समय सुबह 4:30 से 6:00 बजे के बीच होता है। जबकि शाम के समय पूजा सांय 6:00 बजे से 7:30 बजे तक की जातीहै।

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