आखिर क्यों होता है केवल खंडित शिव लिंग का पूजन….

-अन्य सभी देवी देवताओं की प्रतिमाओं का होता है जल प्रवाह
भारतीय संस्कृति में मूर्ति पूजा का अत्याधिक महत्व माना गया है। मूर्ति को स्वतः देखते ही श्रद्धा भाव मन में समाहित हो जाते हैं। इंसान का सर अपने आप ही मूर्ति या फिर धार्मिक स्थल के सामने झुक जाता है। शास्त्रों के अनुसार केवल खंडित शिव लिंग का पूजन उत्तम माना जाता है। जबकि अन्य सभी देवी देवताओं की खंडित प्रतिमाओं का पूजन नहीं किया जाता है। इन खंडित प्रतिमाओं को जल प्रवाह कर देने की परंपरा बनी हुई है।


केवल खंडित शिव लिंग का पूजन उत्तम
खंडित प्रतिमा में केवल शिव लिंग के पूजन को ही उत्तम माना गया है। भगवान शिव इसका एखमात्र अपवाद है। इसका मुख्य कारण भगवान शिव को महादेव का दर्जा प्राप्त होना है। क्योंकि भगवन शिव इस ब्रह्मांड के कण-कण में विद्यमान है। शिवलिंग किसी भी तरह का हो, उसका हर तरफ से पूजन किया जा सकता है। क्योंकि अन्य सभी प्रतिमाओं का केवल सामने से ही पूजन किया जा सकता है। ऋषि मुनियों अनुसार खंडित शिवलिंग को भी घर में भी रखा जा सकता है। उसका पूजन भी किया जा सकता है। केवल भगवान शिव ही एेसे देवता हैं। जिनके विश्व भर में सबसे अधिक मंदिर हैं।

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खंडित प्रतिमा का क्यों नहीं होता है पूजन
शास्त्रों अनुसार किसी भी आराध्य देवी देवता की प्रतिमा पूर्ण होनी चाहिए। प्रतिमा के किसी भी तरह से खंडित होने पर उस प्रतिमा को पूजन के अयोग्य मान लिया जाता है। या यूं कहें कि खंडित मूर्ति का पूजन करना अशकुन माना जाता है। शास्त्रों अनुसार जब हम कहीं भी मूर्तियों को स्थापित कर उसका विधि विधान से पूजन करते हैं, तो उन प्रतिमाओं में उस देवी देवता के प्राण प्रतिष्ठित हो जाते हैं। वहीं प्रतिमा के खंडित होने से पूजा निष्फल हो जाती है। खंडित प्रतिमा की पूजा करते समय यदि मूर्ति को देखते हैं, तो हमारा ध्यान प्रतिमा के खंडित भाग पर केंद्रित हो जाता है। जिस वजह से हमारी पूजा बाधित हो जाती है। पूजा सही ढंग से न होने से हम अराध्य का सही ढंग से आशीर्वाद भी हासिल नहीं कर पाते हैं। खंडित मूर्ति को घर में या मंदिर में रखना भी अशुभ माना जाता है। इन प्रतिमाओं को जल प्रवाह करना सबसे उत्तम है।

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प्रतिमाओं के पूजन करने की विधि
केवल हिंदू धर्म में ही पूरे विधि विधान से पूजा की जाती है। पूजा करने के भी कई नियम हैं। कोई भी आदमी बिना स्नान किए किसी भी प्रतिमा को अशुद्ध हाथों से नहीं छू सकता है। न ही पूजा कर सकता है। देवी देवताओं को चढ़ाने वाला प्रसाद भी शुद्ध हाथों से ही चढाया जाना चाहिए।

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