लक्ष्मण को बचाने के लिए आवाज की रफ्तार से दोगुणा तेज उड़े थे हनुमान

-महज दो घंटे में पांच हजार किलोमीटर की थी दूरी तय
यह हम सभी जानते हैं कि भगवान श्री राम के परम भक्त, देवों के देव महादेव भगावन शंकर के अवतार हनुमान जी ने भगवान राम और रावण के मध्य चल रहे युद्ध में लक्ष्मण जी के मूर्छित होने पर संजीवनी बूटी लाकर प्राण बचाए थे। परंतु क्या आपने कभी यह सोचा है कि आखिर कैसे हनुमान जी ने पांच हजार किलोमीटर की दूरी तय कर संजीवनी बूटी लाए। आपके मन में उठने वाले इन सवालों के जवावों को खोजने के लिए हमने कुछ तत्य़ों का सहारा लिया। आईए आपको इन तथ्यों के बारे अवगत करवाते हैं। ताकि आप भी जान सकें कि हनुमान जी ध्वनि की रफ्तार से भी दोगुणा तेज उड़ने में सक्षम थे।

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हनुमान जी पवन पुत्र होने के सौभाग्य़ को किया चिरतार्थ
माता सीता जी के हरण के बाद भगवान श्री राम और लंकापति रावण के मध्य हुए भीष्ण युद्ध के दौरान लक्ष्मण और मेधनाद के मध्य युद्ध हुआ था। जिसमें लक्ष्मण जी मूर्छित हुए। जानकारी अनुसार लक्ष्मण और मेघनाथ के युद्ध से पहले मेघनाथ ने अपने कुलदेवी की तपस्या शुरू की थी । मेघनाथ ने यह तपस्या पूरा दिन की। इस पूजा की खबर जब श्रीराम जी मिली, तो विभीषण ने बताया कि अगर मेघनाथ की तपस्या पूर्ण हो गई तो मेघनाथ अमर हो जाएगा। इसीलिए मेघनाथ की तपस्या को भंग कर युद्ध के लिए ललकारना होगा। इसके बाद हनुमान जी व अन्य वानर सेना मेघनाथ की तपस्या भंग करने गए। जिसमें वह सफल भी हुए, लेकिन तब तक रात हो चुकी थी। जब |लक्ष्मण जी ने रात को ही मेघनाथ को युद्ध के लिए ललकारा। रामायण के अनुसार उस समय रात्रि का दूसरा पहर शुरु हो चुका था| माना जाता है कि रात्रि का पहला पहर सूर्य अस्त होते ही शुरू हो जाता है। और सूर्य उदय होने के साथ ही रात्रि का अंतिम यानी चौथा पहर खत्म हो जाता है। दिन और रात्रि के कुल आठ पहर होते हैं। यानिकि हर पहर तीन घंटे का होता है। मौजूदा समय अनुसार यदि गणना की जाए तो लक्ष्मण और मेघनाथ का युद्ध रात नौ बजे शुरू हुआ होगा।

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युद्ध बेहद घनघौर होने के कारण एक पहर यानि तीन घंटे तक चला था। इस दौरान मेघनाथ ने अपने शक्तिशाली अस्त्र का प्रयोग कर लक्ष्मण जी मूर्छित कर दिया। एेसे में लक्ष्मण जी के मूर्छित होने का समय लगभग 12:00 बजे के आसपास का रहा होगा। मेघनाथ ने मूर्छित लक्ष्मण जी को उठाने की जी तोड़ कोशिश की। जबकि लक्ष्मण जी तो शेषनाग के अवतार है। जो शेषनाग समस्त पृथ्वी को अपने फन पर उठा सकता हो, उस शेषनाग के अवतार को भला मेघनाथ क्या उठा पाता। लक्ष्मण जी को न उठा पाने पर मेघनाथ वापिस चला गया। श्री राम अपने प्राणों से भी प्यारे भाई को मूर्छित देखकर शोक में डूब गए। इसी दौरान विभीषण के कहने पर हनुमान जी लंका से राज्य वैद्य को जबरन उठा लाए। यदि लक्ष्मण जी अगर रात 12 बजे मूर्छित हुए। तो जाहिर है उसके बाद श्री राम के शोक और विभीषण द्वारा सुषेण वैद्य को लाने कम से कम एक घंटे का तो समय लग ही गया होगा।

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रात्रि एक बजे वैद्य द्वारा लक्ष्मण की जांच करने और उनके प्राण बचाने के लिए संजीवनी बूटी लाने की सलाह देने और हनुमान जी को संजीवनी बूटी लाने के लिए प्रस्थान करने में भी कम से कम आधा घंटा जरूर लगा होगा। बजरंगबली हनुमान जी मौजूदा समय गणना अनुसार डेढ बजे संजीवनी बूटी लाने के लिए लंका से उड़े होंगे । डेढ़ बजे लक्ष्मण जी की जान बचाने के लिए हनुमान जी उड़े और पांच बजे तक वापिस भी आ गये। इसका मतलब हनुमान जी महज साढे तीन घंटे में द्रोणागिरी पर्वत उठाकर वापिस आए।

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इन साढे तीन घंटों की उड़ान के दौरान हनुमान जी को कुछ समस्याओं का भी सामना करना पड़ा। लंका से निकलकर पवन पुत्र हनुमान भारत पहुंचे। इस दौरान रास्ते में उन्हें कालनेमि नामक राक्षस अपना रूप बदले मिला। कालनेमि निरंतर श्री राम का जप कर था। जबकि उसकी असल मंशा हनुमान जी का समय खराब करने की थी। जब हनुमान जी ने जंगल से राम नाम का जाप सुना, तो वह नीचे उतर आए। कालनेमि ने खुद को ज्ञानी बताते हुए हनुमान जी को स्नान करके आने को कहा। इसके बाद रावण युद्ध का नतीजा बताने की बात कही। भोले हनुमान जी उसकी बातों में आ स्नान करने चले गए। स्नान के दौरान उनका सामना एक मगरमच्छ से हुआ. जिसे हनुमान जी ने मार डाला। मगमच्छ की आत्मा ने हनुमान को उस कपटी कालनेमि के बारे बताया। तब बजरंगबली ने उसे भी अपनी पूंछ में लपेटकर परलोक भेज दिया। अब इस घटनाक्रम में हनुमान जी का कम से कम आधा घंटा जरूर खराब हुआ होगा। उसके बाद बजरंगबली ने उड़ान भरी और द्रोणागिरी पर्वत जा पहुंचे। अब हनुमान जी संजीवनी बूटी के बारे कोई जानकारी नहीं रखते थे। संजीवनी को खोजने के लिए वह काफी देर तक भटकते रहे होंगे। इसमें भी उनका कम से कम आधा घंटा जरुर खराब हुआ होगा। बूटी के न पहचान पाने पर हनुमान जी ने पूरा पर्वत उठा लंका की तरफ उड़ चले, लेकिन हनुमान जी के लिए रास्ते एक अन्य मुसीबत आ गई |

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जब पवन पुत्र पर्वत लिए अयोध्या के उपर से उड़ रहे थे, तो भरत ने सोचा कि यह कोई राक्षस अयोध्या के उपर से जा रहा है। तो उन्होंने बिना सोचे समझे बाण चला दिया। वाण लगने से वीर हनुमान श्री राम का नाम लेते धरती पर आ गिरे। हनुमान जी के मुंह से श्री राम का नाम सुनते ही भरत दंग रह गए। जब हनुमानजी से समूची जानकारी प्रदान की। भरत ने उनसे माफी मांग कर उनका उपचार किया गया। तब हनुमान जी वापिस लंका उडे़। इन सभी घटनाओं में भी बजरंगबली के कीमती समय का कम से कम आधा घंटा फिर से खराब हुआ होगा।

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आईए अब हनुमान जी के उड़ने के समय पर गौर करें…
अब हनुमान जी के पास सिर्फ दो घंटे थे। इन दो घंटों में वह लंका से द्रोणागिरी पर्वत आए और वापिस आए।| अब अगर हम हनुमान जी द्वारा तय की इस दूरी को देखें तो श्रीलंका से द्रोणागिरी पर्वत तक की दूरी लगभग 2500 किलोमीटर है। यानिकि आने जाने की यह दूरी दोनों तरफ से मिलाकर पांच हजार किलोमीटर बनती है। बजरंगबली ने यह पांच हजार किलोमीटर की दूरी मात्र दो घंटे में तय की। इस हिसाब से हनुमान जी के उड़ने की रफ्तार लगभग 2500 किलोमीटर प्रति घंटा निकलती है। अगर ध्वनि की रफ्तार की बात करें, तो हनुमानजी की गति ध्वनि की रफ्तार से भी लगभग दो गुना अधिक थी। मौजूदा समय में भारत के पास लड़ाकू विमान मिग 29 की रफ्तार 2400 किलोमीटर प्रति घंटा है। यहां पर हनुमान जी की उड़ने की गति मिग से भी 100 किलोमीटर प्रति घंटा अधिक है। या यूं कहें कि हनुमान जी लड़ाकू विमान से भी अधिक तेज उड़ने में सक्षम थे।

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प्रदीप शाही

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