पांच पांडवों, द्रोपदी में से सबसे पहले किसकी हुई मौत…

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-केवल युधिष्ठर ही क्यों सशरीर स्वर्ग पहुंचे
यह विधि का विधान है कि इस नश्वर संसार में जन्म लेने वाला हर जीव नर हो या नारायण सभी मौत को प्राप्त होते है। द्वापर काल में हुए महाभारत युद्ध में अनगिनत योद्धा काल का ग्रास बने। युद्ध में जीत हासिल करने के कुछ समय बाद यदुवंशी भी आपस में लड़ने झगड़ने लगे। यदुवंशियों का संप्रूर्ण साम्राज्य समाप्त हो गया। इनके नाश की बात सुनकर पांडवों को भारी आघात लगा। तब उन्होंने परलोक जाने का फैसला किया। राज-पाठ त्याग कर स्वर्ग जाने की चाहत लिए पांडवों में से कुछ-कुछ अंतराल के बाद एक के बाद एक पांडव मौत की आगोश में चल गए। क्या आप जानते हैं कि पांच पांडवों व द्रोपदी में सबसे पहले किसकी मौत हुई। क्या सभी स्वर्ग तक पहुंचने में सफल रहे। आईए इस रहस्य पर से गिरे पर्दे को उठा कर आपको एक नई जानकारी से अवगत करवाते हैं।

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महाप्रस्थानिक पर्व में दर्ज है पांडवों की मोक्ष यात्रा का उल्लेख
महाभारत में 18 पर्व का उल्लेख है। इनमें एक महाप्रस्थानिक पर्व भी है। जिसमें पांडवों की मोक्ष की यात्रा का उल्लेख वर्णित है। गौर हो यदुवंशियों यानि कि श्री कृष्ण के साम्राज्य समाप्त होने की जानकारी के बाद युधिष्ठर ने सभी भाईयों व पत्नी सहित राज पाठ को त्याग कर राज्य की देखरेख का जिम्मा परीक्षित को सौंप भारत वर्ष की यात्रा करने के बाद मोक्ष हासिल करने के उद्देश्य से सभी पांडव व द्रोपदी हिमालय की गोद में चले गए। वहां से मेरु पर्वत के पार उन्हें स्वर्ग का रास्ता मिल गया था, लेकिन इस यात्रा को युधिष्ठर को छोड़ कर द्रोपदी , भीम, अर्जुन, नकुल औऱ सहदेव पूरा नहीं कर पाए।

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पांच पांडवों, द्रोपदी में से सबसे पहले किसकी हुई मौत

सभी पांडव इस लोक को त्याग कर परलोक जाने के लिए निकल पड़े। रास्ते में पांडवों के साथ एक कुत्ता भी चलने लगा। अनेकों तीर्थों, नदियों और समुद्रों की यात्रा करते-करते पांडव आगे बढ़त रहे। आखिर पांडव लाल सागर पहुंच गए। इस यात्रा के दौरान अर्जुन अपना गांडीव धनुष और अक्षय तरकस को साथ ही लिए रहे। लाल सागर के पास अग्निदेव ने उपस्थित हो कर अर्जुन को अपना गांडीव धनुष और अक्षय तरकस को त्यागने के लिए कहा। अर्जुन ने ऐसा ही किया। पृथ्वी की परिक्रमा पूरी करने के बाद पांडव हिमालय तक पहुंच गए हिमालय पार कर पांडव आगे बढ़े तो उन्हें बालू का समुद्र दिखाई पड़ा। इसके बाद वह मेरु पर्वत पहुंचे। इसी दौरान द्रोपदी लड़खड़ा कर गिर पड़ी। द्रोपदी को नीचे गिरा देखकर भीम ने युधिष्ठिर से पूछा कि द्रोपदि ने तो कभी कोई पाप नहीं किया, तो फिर क्या कारण है कि वह पहले क्यों निष्प्राण हो गई। तब युधिष्ठिर ने कहा कि द्रोपदि वीर अर्जुन से अधिक प्रेम करती थी। इसीलिए उनके साथ ऐसा हुआ है। कुछ समय बाद सहदेव के निष्प्राण होने पर युधिष्ठिर ने कहा कि वह अपने जैसा विद्वान किसी को नहीं समझता था। इसी अंहकार के कारण वह मौत का शिकार हुए हैं। इसके कुछ समय बाद नकुल के गिरने पर युधिष्ठिर ने बताया कि नकुल को अपने रूप पर बहुत अभिमान था इसीलिए उनकी यह गति हुई है। थोड़ी देर के बाद अर्जुन भी गिर पड़े। तब युधिष्ठिर ने कहा कि अर्जुन को अपने पराक्रम पर बहुत अभिमान था। अर्जुन ने कहा था कि एक ही दिन में शत्रुओं का नाश कर देंगे, लेकिन ओ ऐसा नहीं कर पाए। अपने अभिमान के कारण ही अर्जुन की यह हालत हुई है। थोड़ा आगे चलने पर भीम भी गिर पड़े। तो युधिष्ठिर ने भीम के निष्प्राण होने से पहले कहा कि तुम बहुत खाते थे, और अपने बल का झूठा प्रदर्शन करते थे। इसीलिए उन्हें भूमि पर गिरना पड़ा। यह कहकर युधिष्ठिर आगे चल दिए केवल वह कुत्ता ही उनके साथ चलता रहा।

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स्वर्ग ले जाने के लिए देवराज इंद्र प्रकट हुए
युधिष्ठिर कुछ ही दूर चले थे कि उन्हें स्वर्ग ले जाने के लिए देवराज इंद्र अपना रथ लेकर आ गए। युधिष्ठिर ने कहा कि मेरे भाई और द्रौपदी मार्ग में गिरे पड़े हैं। उन्हें भी साथ ले लें। तब इंद्र ने कहा कि वह सभी अपना शरीर त्याग कर स्वर्ग पहुंच चुके हैं। केवल आप ही सशरीर स्वर्ग में जाएंगे। इंद्र की बात सुनकर युधिष्ठिर ने कहा कि यह कुत्ता मेरा परम भक्त है, इसलिए इसे भी मेरे साथ स्वर्ग जाने दें, लेकिन इंद्र ने ऐसा करने से मना कर दिया। परंतु युधिष्ठिर बिना कुत्ते के स्वर्ग जाने को राजी नहीं हुए। तब कुत्ते के रूप में यमराज अपने वास्तविक रूप में आ गए। युधिष्ठिर को अपने धर्म में स्थित देखकर यमराज बहुत प्रसन्न हुए। तब देवराज इंद्र युधिष्ठिर को अपने रथ में बिठाकर स्वर्ग ले गए। स्वर्ग में युधिष्ठिर ने वहां दुर्योधन एक दिव्य सिंहासन पर बैठे देखा। यह देख युधिष्ठिर ने देवताओं से कहा कि मेरे भाई और द्रोपदी कहां है। मैं भी वहीं जाना चाहता हूं। तब देवताओं ने कहा कि यदि आपकी यही इच्छा है, तो आप इस देवदूत के साथ चले जाएं।

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युधिष्ठर अपने भाईयों व द्रोपदी से कहां मिले
देवदूत युधिष्ठिर को ऐसे मार्ग पर ले गया जो अंधकार और दुर्गंध से भरा हुआ था। वहां की दुर्गंध से तंग आकर युधिष्ठिर ने देवदूत से पूछा कि हमें इस मार्ग पर अभी कब तक चलना होगा। तब देवदूत ने कहा कि देवताओं ने कहा था कि जब आप थक जाएं, तो आपको वापिस ले आऊं। तब युधिष्ठिर ने ऐसा ही करने का निश्चय किया। जब युधिष्ठिर वापस लौटने लगे तो उन्हें कुछ आवाजें सुनाई दी। यह सब युधिष्ठिर से वही रुकने के लिए कह रहे थे। युधिष्ठिर ने जब उनका परिचय पूछा तो पता चला कि वह कर्ण, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव और द्रौपदी हैं। तब युधिष्ठिर ने देवदूत से कहा कि तुम देवताओं के पास लौट जाओ, मेरे यहां रहने से यदि मेरे भाइयों को सुख मिलता है तो मैं यहीं रुकूंगा। देवदूत ने यह बात जाकर देवराज इंद्र को बता दी युधिष्ठिर के उस स्थान पर कुछ देर रुकने पर ही सभी देवता वहां प्रकट हुए। वहां सुगंधित हवा चलने लगी मार्ग पर प्रकाश छा गया। तब देवराज इंद्र ने युधिष्ठिर को बताया कि तुमने अश्वत्थामा के मरने की बात कहकर छल किया। इसी परिणाम स्वरुप तुम्हें भी छल से कुछ देर नर्क के दर्शन करने पड़े। अब तुम मेरे साथ स्वर्ग चलो। वहां तुम्हारे भाई पहले से ही पहुंच गए हैं। इस तरह युधिष्ठिर अपने भाइयों और द्रौपदी को स्वर्ग में देख कर बहुत प्रसन्न हुए।

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प्रदीप शाही

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