यहां पर भगवान शिव मणि के रूप में देते हैं दर्शन

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इस पर्वत पर चढ़ने के नाम से डरते हैं लोग

देव भूमि हिमाचल प्रदेश अपने ऐतिहासिक व पौराणिक मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। हिमाचल में देवी-देवताओं से संबंधित अनेक मंदिर हैं जो आज भी भक्तों के लिए श्रद्धा का केन्द्र बने हुए हैं। हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु इन मंदिरों के दर्शन करने आते हैं। हिमाचल प्रदेश में भगवान शिव से संबंधित मंदिर कई प्रसिद्ध मंदिर हैं। जहां पर माना जाता है कि भगवान शिव किसी ना किसी रूप में दर्शन देते हैं। ऐसा ही एक आस्था का केन्द्र तीर्थ स्थल है ‘मणिमहेश’। माना जाता है कि इस स्थान पर भगवान शिव ने कई सदियों तक तप किया था। इसके बाद से यह पर्वत रहस्यमयी बन गया और कई कथाएं इसके साथ जुड़ गई। कहा जाता है कि आज तक इस पर्वत पर कोई नहीं चढ़ पाया जो ऊपर गया वह आज तक वापिस नही लौटा।

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मणि रूप में होते हैं भगवान शिव के दर्शन

विश्व प्रसिद्ध ‘मणिमहेश’ तीर्थ स्थान देव भूमि हिमाचल में तहसील भरमौर में पीर पंजाल की पहाड़ियों के पूर्वी भाग में स्थित है। यह तीर्थ स्थान चंबा से 85 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस स्थान पर मणिमहेश नाम का एक सरोवर है जो समुद्र तल से तकरीबन 13,500 फुट की ऊंचाई पर है। इसी सरोवर की पूर्व दिशा में स्थित है यह पवित्र पर्वत। माना जाता है कि मणिमहेश के शिखर पर भगवान शिव चमकती हुई मणि के रूप में अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। मणिमहेश शिखर पर भोर में एक प्रकाश उभरता है जो बाद में तेज़ी से यहां पर स्थित झील में प्रवेश कर जाता है। मान्यता है कि भगवान शिव पर्वत पर बने अपने स्थान पर बिराजमान होने के लिए आ गए हैं। तथा जो प्रकाश उभरता है वह उनके गले में सुशोभित नाग की मणि का है।

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ऐसे पड़ा ‘मणिमहेश’ नाम

विद्वानों के अनुसार इस पर्वत के शिखर पर भगवान शिव शेषनाग मणि के रूप में बिराजमान हैं। इसी रूप में शिव अपने भक्तों को दर्शन भी देते हैं। इसके अतिरिक्त मणि महेश शब्द का अर्थ है महेश के मुकुट में नगीना।

पार्वती के साथ रहने के लिए बनाया ‘मणिमहेश’

माना जाता है कि भगवान शिव ने पार्वती के संग रहने के लिए मणिमहेश की रचना की थी। इस स्थल पर भगवान शिव शिवलिंग के रूप में बिराजमान हैं और माता पार्वती को यहां देवी गिरिजा के रूप में जाना जाता है।

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पर्वत पर चढ़ना है असंभव

माना जाता है कि मणिमहेश पर्वत पर चढ़ाई करना नामुमकिन है। जो भी इस पर्वत पर गया वापिस नहीं लौटा। 1968 में इंडो-जपानीस की एक टीम ने इस पर्वत पर चढ़ाई की कोशिश की लेकिन असफल रही।

पर्वत की चढ़ाई से जुड़ी कथाएं

स्थानीय लोगों के अनुसार कई वर्ष पहले एक गड़रिया अपनी भेडों के साथ इस पर्वत पर चढ़ रहा था लेकिन पर्वत के शिखर पर पहुंचने से पहले ही वह अपनी भेडों के सहित पत्थर का बन गया। माना जाता है कि आज भी गड़रिया व उसकी भेडें छोटे-छोटे पत्थरों के रूप में मणिमहेश पर्वत पर मौजूद हैं। एक और कथा के अनुसार एक सांप ने भी शिखर तक पहुंचने की कोशिश की लेकिन वह भी पत्थर का बन गया।

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सूर्य की किरणों से बदलता है रंग

सूर्यास्त के समय जब सूर्य की किरणें पर्वत के शिखर पर पड़ती हैं तो सम्पूर्ण दृश्य स्वर्णिम हो जाता है। माना जाता है कि मणिमहेश पर्वत पर शाम या रात के मध्यकाल के समय में भगवान शिव दर्शन देते हैं। अगर मौसम साफ रहे तो भक्त आसानी से शिखर पर बिराजमान भगवान शिव के दर्शन कर सकते हैं। लोगों का मानना है कि मणिमहेश पर्वत का शिखर हमेशा बादलों या बर्फ से ढका रहता है। यह भी कहा जाता है कि यह शिखर उसी को दिखाई देता है जो भगवान शिव को उस समय सच्चे मन से याद कर रहा हो या पूरी तरह से पाप मुक्त हो।

मणिमहेश’ की यात्रा

मणिमहेश यात्रा की खोज का श्रेय सिद्ध योगी चरपटनाथ जी को जाता है। यात्रा आरम्भ करने से पहले भरमौर से 6 किलोमीटर की दूरी पर एक पहाड़ी के शिखर पर ब्रह्मा जी की पुत्री भ्रमाणी का मंदिर स्थित है। यात्रा से पहले यहां पर माथा टेकने से ही मणिमहेश की यात्रा पूर्ण मानी जाती है। चंबा से 65 किलोमीटर दूर भरमौर चौरासी में रुकने के बाद यात्री आगे बढ़ते हैं। भरमौर चौरासी भी एक धार्मिक स्थल है जो चौरासी सिद्धों के तपस्थल के रूप में प्रसिद्ध है यहां पर धर्मराज का मंदिर स्थित है। चंबा से भरमौर की दूरी 70 किलोमीटर व भरमौर से हड़सर की दूरी 13 किलोमीटर है। हड़सर से संकरे, पत्थरीले रास्ते से होते हुए 14 मील की पैदल यात्रा है। इसके उपरांत भक्त गौरी कुंड व शिव क्रोत्री नामक स्थान पर पहुंचते हैं और मणिमहेश के लिए रवाना होने से पहले महिला भक्त गौरी कुंड में तथा पुरुष भक्त शिव क्रोत्री कुंड में स्नान करते हैं। गौरी कुंड पहुंचने के बाद कैलाश शिखर के दर्शन होते हैं फिर यहां से डेढ़ किलोमीटर की सीधी चढ़ाई के बाद श्रद्धालु मणिमहेश झील तक पहुंचते है। इसी झील से भगवान शिव के भक्त पावन मणिमहेश के दर्शन करते हैं।

धर्मेन्द्र संधू

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