ॐ  आकार के द्वीप पर है स्थित, प्राचीन ॐकारेश्वर मंदिर

-इस द्वीप पर स्थित ममलेश्वर मंदिर की भी है विशेष महानता

प्रदीप शाही

भारत ही नहीं विश्व भर में आज भी धरती की खुदाई के दौरान भारतीय सनातन संस्कृति के दर्शन सहज ही हो जाते है। जो इस बात को प्रमाणित करते हैं कि इस धरती पर भारतीय सनातन संस्कृति सबसे पुरातन है। भारत के कोने-कोने में स्थित हजारों साल पुराने मंदिरों में से मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में भारत की पवित्रतम नदियों में से एक नर्मदा तट पर स्थित प्राचीन मंदिर ॐकारेश्वर मंदिर बेहद विशेष है। ॐ आकार के द्वीप को शिवपुरी द्वीप भी कहा जाता है। यह भगवान शंकर के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इस द्वीप पर ॐकारेश्वर मंदिर के अलावा प्राचीन ममलेश्वर मंदिर भी स्थित है। इन दोनों मंदिरों के दर्शन मात्र से मस्तक आस्था से नमन के लिए झुक जाता है। गौर हो ओंकारेश्वर नगरी का असला नाम मान्धाता है। नर्मदा तट पर जो बस्ती है, उसे विष्णु पुरी कहा जाता है।

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ॐकारेश्वर मंदिर का निर्माण कैसे हुआ ?

भारत की पवित्रतम नदियों में से एक नर्मदा नदी के तट पर स्थित ॐकारेश्वर मंदिर का निर्माण खुद ही हुआ माना जाता है ओंकार शब्द का उच्चारण सर्वप्रथम सृष्टिकर्ता विधाता भगवान श्री ब्रह्मा जी के मुख से हुआ। वेद का पाठ ओंकार के उच्चारण बिना पूर्ण नहीं होता है। इस ओंकार क्षेत्र में 68 तीर्थ हैं। यहां पर 33 कोटि देवी-देवता परिवार संग वास करते हैं। इतना ही नहीं इस क्षेत्र में दो  ज्योतिस्वरूप लिंगों सहित 108 प्रभावशाली शिवलिंग भी हैं। सबसे खास बात यह है कि मध्यप्रदेश में देश भर में स्थापित 12 ज्योतिर्लिंगों में से दो ज्योतिर्लिंग एक उज्जैन में महाकाल के रुप में दूसरा ओंकारेश्वर में ओंकारेश्वर-ममलेश्वर के रुप में स्थापित हैं। माना जाता है कि देवी अहिल्याबाई होल्कर ने यहां पर अठरह हजार शिवलिंगों का निर्माण कर उनका पूजन करने के बाद सभी को नर्मदा नहीं में प्रवाहित कर दिया था।

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ॐकारेश्वर मंदिर की कथा

कहा जाता है कि राजा मान्धाता ने नर्मदा नदी के तट पास स्थित पर्वत पर भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की। देवों के देव महादेव ने प्रसन्न हो कर वरदान मांगने के लिए कहा। तब राजा मान्धाता ने भोले बाबा को इसी स्थान निवास करने का वरदान मांगा। तभी से यह स्थान एक तीर्थ के रुप में ओंकार-मान्धाता के रूप से जानी जाने लगी। शास्त्रों अनुसार कोई भी इंसान चाहे सारे तीर्थ कर ले। परंतु जब तक वह ॐकारेश्वर मंदिर आकर अन्य सभी तीर्थों का जल लाकर यहां नहीं चढ़ाता। तब तक उसके सारी तीर्थ यात्रा अधूरी ही रहती है। यह भी कहा जाता है कि यमुना जी में 15  दिन और गंगा जी में सात दिनों का स्नान जो फल मिलता है। उतना पुण्य फल तो नर्मदा जी के दर्शन मात्र से हासिल हो जाता है। यह भी माना जाता है कि इस मंदिर में शिव भक्त कुबेर ने तपस्या कर शिवलिंग की स्थापना की थी। तब भगवान शिव ने कुबेर को देवताओ का धनपति बनाया था। कुबेर के स्नान के लिए भगवान शिव ने अपनी जटा के बाल से कावेरी नदी उत्पन्न की थी। भगवान शिव की जटाओं से निकली कावेरी नदी कुबेर मंदिर के पास से निकलती हुई नर्मदा जी में मिल जाती है।

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ॐकारेश्वर मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठित प्रतिमाएं  

नौका द्वारा नर्मदाजी को पार करके भक्तजन मान्धाता द्वीप में पहुंचते हैं। यहां पर स्नान करने के बाद भक्त सीढ़ियों से चढ़ ॐकारेश्वर मंदिर का दर्शन करते हैं। मंदिर के प्रांगण में पंचमुखी भगवान श्री गणेश जी की प्रतिमा है। प्रथम तल पर ॐकारेश्वर लिंग रुप में विराजमान हैं। श्री ॐकारेश्वर मंदिर का यह लिंग अनगढ़ है। यह लिंग मन्दिर के ठीक शिखर के नीचे नहीं है। सबसे खास बात यह है कि लिंग के चारों तरफ जल भरा रहता है। मंदिर का मुख्य द्वारा बेहद छोटा है। ऐसा प्रतीत होता है, कि जैसे हम किसी गुफा में प्रवेश कर रहे हैं। लिंग के पास ही माता पार्वतीजी की प्रतिमा स्थापित है।

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ॐकारेश्वर मंदिर में सीढ़ियां चढ़कर दूसरी मंजिल पर जाने पर महाकालेश्वर लिंग के दर्शन होते हैं। इस मंजिल पर लिंग शिखर के नीचे है। तीसरी मंजिल पर सिद्धनाथ लिंग, चौथी मंजिल पर गुप्तेश्वर लिंग और पांचवीं मंजिल पर ध्वजेश्वर लिंग है। यह सभी लिंग शिखर के नीचे स्थापित हैं। सबसे खास बात यह है कि तीसरी, चौथी व पांचवीं मंजिलों पर स्थित लिंगों के उपर स्थित छतों पर अष्टभुजाकार आकृतियां बनी हैं। पहली और दूसरी मंजिल के प्रांगणो में नंदी महाराज की मूर्तियां स्थापित हैं। तीसरी मंजिल पर नंदी महाराज की मूर्ति नहीं है।

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ॐकारेश्वर मंदिर की परिक्रमा में रामेश्वर मंदिर और गौरी सोमनाथ के दर्शन हो जाते हैं। ॐकारेश्वर मंदिर के पास अविमुतश्वर, ज्वालेश्वर, केदारेश्वर भगवान के कई मंदिर हैं। इसके अलावा इस तीर्थ क्षेत्र में चौबीस अवतार, माता घाट, सीता वाटिका, धावड़ी कुंड, मार्कण्डेय शिला, मार्कण्डेय संन्यास आश्रम, अन्नपूर्णाश्रम, बडे हनुमान जी, खेड़ापति हनुमान जी, ओंकार मठ,, ऋणमुक्तेश्वर महादेव, गायत्री माता मंदिर, आड़े हनुमान, माता वैष्णोदेवी मंदिर, भगवान श्री विष्णु जी मंदिर, ब्रह्मेश्वर मंदिर, महाराज का मंदिर, काशी विश्वनाथ, नरसिंह टेकरी, कुबेरेश्वर महादेव, चन्द्रमोलेश्वर महादेव के मंदिर दर्शनीय हैं। मान्धाता टापू से ॐकारेश्वर मंदिर की दो परिक्रमाएं एक छोटी औऱ एक बड़ी होती हैं। तीन दिवसीय इस यात्रा में यहां के सभी तीर्थ आ जाते हैं।

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ॐकारेश्वर मंदिर में अमलेश्वर मंदिर का बाहरी दृश्य

ममलेश्वर मंदिर भी एक ज्योतिर्लिंग है। ममलेश्वर मंदिर अहिल्याबाई का बनवाया हुआ है। भोले बाबा के अनन्य भक्त अंबरीष और मुचुकुन्द के पिता सूर्यवंशी राजा मान्धाता ने इस स्थान पर कठोर तपस्या करके भगवान शंकर को प्रसन्न किया था। राजा मान्धाता के नाम पर ही इस पर्वत का नाम मान्धाता पर्वत हो गया। मंदिर के उपरी भाग पर स्थित भगवान महाकालेश्वर की मूर्ति लगी है। यह मान्यता है कि यह पर्वत ही ओंकाररूप है। यहां पर भगवान शिव शंकर को चने की दाल चढ़ाने की परंपरा है।

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